तुम चलो! बस चलते ही रहो! चलना ही तुम्हारी नियति है

तुम चलो! बस चलते ही रहो! चलना ही तुम्हारी नियति है। ट्रेनों का इंतजार मत करो, बस के सहारे की आस मत करो, यह बड़ी-बड़ी मोटर गाड़ियों में बैठने के ख्वाब मत देखो

तुम चलो! बस चलते ही रहो! चलना ही तुम्हारी नियति है

सुभाष तिवारी की कलम से - तुम चलो! बस चलते ही रहो! चलना ही तुम्हारी नियति है। ट्रेनों का इंतजार मत करो, बस के सहारे की आस मत करो, यह बड़ी-बड़ी मोटर गाड़ियों में बैठने के ख्वाब मत देखो, तुम चलो अपने पैरों को मजबूत बना कर चलो! पांव के छाले मत देखो, यह बनते बिगड़ते रहते हैं किसे परवाह है, जो तुम इन की परवाह किए जा रहे हो ।

तुम चलते रहो! पंजाब से चलो, गुजरात से चलो, तमिलनाडु से चलो, कर्नाटक से चलो, हैदराबाद से चलो, दिल्ली से चलो, मुंबई से चलो, पुणे से चलो] बस चलो और चलते रहो ।

अब तुम्हें याद आ रही है अपनी जन्म भूमि की, जहां तुम पैदा हुए, जहां तुम्हारे सारे संबंध सारे रिश्तेदार, सारे नाते हैं , हो सकता है तुम्हारी थोड़ी बची हुई जमीन भी हो जिस पर तुम्हारा वृद्ध पिता कुछ उगाने की नाकाम कोशिश करता हो! तुम चले थे अपने खुद के काम को छोड़कर शहर की चकाचौंध में अपने लिए सुनहरा भविष्य खोजने |

दुकानों में काम करते हुए, फैक्ट्रियों में काम करते हुए, कपड़े सिलते हुए, कचरे उठाते हुए, शहरों में बड़े बड़े घरों की पुताई करते हुए, ईटा गारा मजदूर बनकर घर बनाते हुए, होटलों में बर्तन धोने और वेटर का काम करते हुए , ठेले और रेहड़ी लगाते हुए, सब्जी मंडियों में पल्लेदारी करते हुए], ड्रायवर, माली , घरेलु नौकर बनकर तुम अपने सुनहरे भविष्य की मृग मरीचिका में खोए हुए थे, कि अचानक प्रकृति ने या मनुष्य की अतिशय महत्वाकांक्षा ने तुम्हे चेतावनी देते हुए एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ से सिर्फ तुम्हारे लिए परावर्तन ही विकल्प बचता है|

तुमने सोचा था कि गांव में तुम्हारा कोई भविष्य नहीं इसलिए आए थे शहरों में| तुम्हें सपने दिखाए गए थे और तुमने सपने देखे थे जो अब लग रहा है कि झूठ है। इस आपदा में समझ सको तो समझ लो कमजोर का ईश्वर भी नहीं होता क्योंकि बलि भी बकरे की ही दी जाती है इसलिए अब हे ! श्रमवीरों प्रकृति भी तुम्हारे साथ नहीं है ,वह भी तुम्हारी मजबूती की परीक्षा ले रही है, तुम्हें और मजबूत बनना होगा दिमाग से भी, शरीर से तो तुम मजबूत हो ही।
तुम्हारी इस शारीरिक मजबूती फायदा हमेशा उठाया गया और अब इसलिए भी रोका जा रहा है ताकि तुम उनके लिए फिर से काम कर सको जिनका इस तालाबंदी में बहुत बड़ा नुकसान हुआ है भुलावे में मत रहना की तुम्हारे भूख और सुरक्षा की चिंता किसी को है , क्योंकि जिन्होंने तुम्हारे (पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति) लिए विचार किया उन्हें दुर्दैव से कार्य करने के पहले ही ईश्वर ने अपने पास बुला लिया और जो उनके उस विचार को लेकर आगे बढे और कार्य करने का अवसर पाया है उन्होंने अब उसमें बदल कर दी है ‘पंक्ति में अंतिम खड़े व्यक्ति’ की जगह ’ पंक्ति में अग्रिम खड़े व्यक्ति ‘ पर वे विचार कर रहे हैं इसीलिए अब तुम आत्मनिर्भर बनो|

तुम लौट रहे हो क्योंकि तुम्हारी आशा टूट चुकी है| तुमने देखा है कि इन दिनों में तुम्हें अगर दो रोटी भी दी गई है तो एक अहसान के बोझ तले दबा दिया गया है, कितनी फोटो खींची गई है मस्कुराकर, सीना तानकर ,तुम्हारे आंखें नीची किये हुए, मुरझाये चेहरे के साथ हाथों में दिए जा रहे सामान के साथ।

जा तो रहे हो पर याद रखना की यदि सुरक्षित पहुंच गए इस प्रकृति के कोप से बचकर, इन व्यवस्थाओं से बचकर, इन लाठी और डंडों से बचकर, इन दुर्घटनाओं से बचकर, तो तुम फिर लौटोगे या नहीं! तुम्हारी मानसिक दुर्बलता ही तुम्हें लौटने को मजबूर करेगी| अगर तुम उस दुर्बलता को दूर कर सको ,शक्तिशाली बनने की सोच सको तो घर में बैठ कर सोचना अपने मां बाप के साए में, सोचना कि क्या इस गांव में रोटी मिल सकती है, अगर कुछ ना हो सके तो कम से कम अपने घर के बूढ़ों से पूछना कि क्या था तुम्हारा पुस्तैनी काम अगर उसमें कुछ नया कर सको तो तुम्हारे लिए अच्छा ही होगा। तुम बढ़ाई बनो, लोहार बनो, चर्मकार बनो, मिस्त्री बनो ,खेतिहर मजदूर बनो, सब्जी उगाओ, पशु पालो कुछ तो होगा ही तुम्हारे करने लायक| और जो भी तुम्हे जंचे उस पर तुम्हारे पास की पूरी शक्ति लगाकर करो ताकि तुम्हें फिर न भटकना पड़े इन कंक्रीट के जंगलों में जहां हर तरफ भयानक स्वार्थ मानवीय संबंधों पर भी हावी है|


अब तो सरकार ने भी कह दिया है आत्मनिर्भर बनो | यहां पर तुम्हारे वापसी के लिए भी राजनीति की जा रही है केंद्र कहता है, राज्य सुविधा मांग नहीं रहे हैं, राज्य कह रहा है केंद्र सुविधाएं नहीं दे रहा है क्यों पड़ते हो इस खेल में इतिहास गवाह है इस खेल में हमेशा नुकसान तुम्हारा ही हुआ है| इस भुलावे में मत रहना की कोई तुम्हारे साथ है या कोई तुम्हारे खिलाफ है| सब समय के साथ बदलते हैं , जब जिसका फायदा होता है वो तुम्हारे साथ होने का ढोंग करता है|

ये मौसम की मार, आंधी-तूफान, ओले ,यह सड़कों के एक्सीडेंट, ट्रेन की पटरी ऊपर तुम्हारा कट जाना, दुधमुहे को बगल में दबाये सर पर गठरी लादे भूखे प्यासे चलती हुयी महिलाएं, कोई हजार किलोमीटर के लिए जा रहा है तो कोई डेढ़ हज़ार तो कोई दो हज़ार किलोमीटर से भी ऊपर की यात्रा पर पैदल, साईकिल , ठेला , ऑटो या फिर ट्रकों में सामानों की तरह ठुंस कर चला जा रहा है | ये दृश्य आँखों के रास्तों दिमाग को सुन्न कर देते हैं | फिर शोचता हूँ ;शायद यही होता होगा श्रमेव जयते के नारे का अर्थ| यही कहा जाता होगा - प्रबंधन , यही होता होगा - ‘minimum govenrment, maximum governence’.


तुम ही तुम्हारे साथ हो | अपने अन्दर भी संतुलन बनाओ | जिनके दिमाग मजबूत है, जिनके लिए तुम अब तक अपने श्रम सस्ते में बेचते आये वो इसे और सस्ता कर रहे हैं। उनको भी मौका मिलना चाहिए अपने दिमाग के साथ-साथ शरीर को मजबूत करने का और तुम्हें भी सोचना होगा कि तुम्हारा शरीर जितना मजबूत है ,उसी के अनुपात में दिमाग भी मजबूत बने| अन्यथा यह खेल निरंतर जारी रहेगा, मजबूत दिमाग हमेशा मजबूत शरीर का उपयोग अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए करता रहेगा|
निर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय|
मुई खाल की साँस ते , सार भसम होय जाय||