कहानी नासा में भारत का लोहा मनवाने वाले वशिष्ट नारायण सिंह की

2 अप्रैल 1942 को बिहार के भोजपुर जिले में जन्में वशिष्ठ नारायण सिंह तकरीबन 40 साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित थे

कहानी नासा में भारत का लोहा मनवाने वाले वशिष्ट नारायण सिंह की
vashishtha narayan singh

2 अप्रैल 1942 को बिहार के भोजपुर जिले में जन्में वशिष्ठ नारायण सिंह तकरीबन 40 साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित थे और पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन जीते हुए उन्होंने प्राण त्याग दिया। पटना के साइंस कॉलेज में वह जब पढ़ाई किया करते थे तो गलती होने पर गणित के अध्यापक को भी टोंक दिया करते थे। जब यह बात कॉलेज के प्रिंसिपल को पता चला तब उनकी अलग से परीक्षा ली गई, तब उन्होंने अकादमी के सारे रिकॉर्ड्स तोड़ दिए थे। पांच भाई बहनों के परिवार में आर्थिक संकट हमेशा बरकरार रहता था, लेकिन उन्होंने सभी बाधाओं को पार किया और अपने प्रतिभा पर ग्रहण लगने नहीं दिया। 

गौरतलब है, बिहार के लाल वशिष्ठ नारायण सिंह ने महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के सापेक्ष के सिद्धान्त को चुनौती दी थी। इसके अलावा जब वह नासा में काम  कर रहे थे तो उस समय अपोलो की लांचिग से पहले 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए थे, लेकिन जब कंप्यूटर शुरु हुए तो वशिष्ठ नारायण सिंह और कंप्यूटर्स के कैलकुलेशन बिल्कुल सटीक था।

वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना साइंस क़ॉलेज में पढ़ते थे तभी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नज़र उन पर पड़ी. कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमरीका चले गए। साल 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। नासा में भी काम किया लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा और 1971 में भारत लौट आए। भारत लौटने के बाद उन्होंने पहले आईआईटी कानपुर, फिर आईआईटी बंबई, और फिर आईएसआई कोलकाता में नौकरी की।

अभी तक स्वर्णिम सफर तय कर रहे वशिष्ठ नारायण सिंह के जीवन में अभी कुछ बड़े बदलाव होने थे। इस बीच 1973 में उनकी शादी वंदना रानी सिंह से हो गई। घरवाले बताते हैं कि यही वह वक्त था जब वशिष्ठ जी के असामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चला। उनकी भाभी प्रभावती बताती हैं, "छोटी-छोटी बातों पर बहुत ग़ुस्सा हो जाना, पूरा घर सर पर उठा लेना, कमरा बंद करके दिन-दिन भर पढ़ते रहना, रात भर जागना उनके व्यवहार में शामिल था। वह कुछ दवाइयां भी खाते थे लेकिन वे किस बीमीरी की थीं, इस सवाल को टाल दिया करते थे। इस असामान्य व्यवहार से वंदना भी जल्द परेशान हो गईं और तलाक़ ले लिया। यह वशिष्ठ नारायण के लिए बड़ा झटका था। जिसके बाद वह इस सदमे से कभी उभर नहीं पाए। 

लगभग यही वक्त था, जब वह ISI कोलकाता में अपने साथी कर्मचारियों के बर्ताव से भी परेशान होने लगे थे। दरअसल, उस समय कई प्रोफेसर्स ने वशिष्ठ नारायण सिंह के शोध को धोखे से अपने नाम से छपवा लिया, जिससे वह काफी परेशान होने लगे और धीरे-धीरे उनकी यह परेशानी बड़ी बीमारी में तब्दील हो गई और आज तक वह सिजोफ्रेनिया से पीड़ित हैं। 

साल 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा, जिसके बाद उनका इलाज शुरु हुआ। लेकिन जब स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ तो 1976 में उन्हें रांची में भर्ती कराया गया। घरवालों की मानें तो अगर उनका अच्छे से इलाज हुआ होता तो वह जल्दी ठीक हो सकते थे, लेकिन पैसे की तंगी की वजह से उन्हें अच्छा इलाज नहीं मिल पाया। अगर सरकार ने भी ध्यान दिया होता तो आज बिहार का यह लाल जिंदगी और मौत से शायद जूझ नहीं रहा होता। बता दें, 1987 में वशिष्ठ नारायण अपने गांव लौट आए। लेकिन 1989 में अचानक ग़ायब हो गए। साल 1993 में वह बेहद दयनीय हालत में डोरीगंज, सारण में पाए गए। मिलने के बाद बिहार सरकार ने उन्हें इलाज के लिए बंगलौर भेजा था, लेकिन बाद में सरकार ने इलाज का खर्चा देना बंद कर दिया और आखिरकार 2019 में इस महान व्यक्ति ने गुमनामी में अपने प्राण त्याग दिए।