वह क्रांतिकारी जिसकी तस्वीर भगत सिंह अपनी जेब में रखते थे

मात्र 19 वर्ष की उम्र में जब कर्तार सिंह सराभा को फांसी के तख्ते पर चढ़ाया गया तो उनका वजन 10 पौंड करीब चाढ़े 4 किलो तक बढ़ गया था

वह क्रांतिकारी जिसकी तस्वीर भगत सिंह अपनी जेब में रखते थे
Kartar Singh Sarabha

यूं तो भगत सिंह के करोड़ों प्रशंसक व समर्थक होंगे। हर युवाओं का प्रेरणास्रोत भगत सिंह जरुर होता है। लेकिन भगत सिंह के प्रेरणास्रोत कौन थे? वो कौन था जिसे भगत सिंह अपना गुरु मानते थे? इस भाग में हम आपको भगत सिंह के गुरु के बारे में बताएंगे और यह भी बताएंगे किस प्रकार भगत सिंह ने उनसे प्रेरणा लेकर स्वतंत्रता  संग्राम में सर्वोच्च बलिदान दिया।

तो सबसे पहले आपकी दुविधा को दूर करते हुए भगत सिंह के गुरु का नाम बताते हैं। उनका नाम है कर्तार सिंह सराभा। यह उनका ही आकर्षण था कि भगत सिंह के मनोमस्तिष्क में क्रांतिकारी भाव पैदा हुआ। मात्र 19 वर्ष की उम्र में जब कर्तार सिंह सराभा को फांसी के तख्ते पर चढ़ाया गया तो उनका वजन 10 पौंड करीब चाढ़े 4 किलो तक बढ़ गया था और वह हंसते हुए फांसी पर चढ़े थे। यह वीर सराभा भगत सिंह के आदर्श थे, जिनकी तस्वीर वह हमेशा अपने जेब में रखा करते थे और हमेशा कहा करते थे कि यही मेरा गुरु, भाई और साथी है। 16 नवंबर 1915 को जब सराभा को फांसी दी गई तो उस वक्त भगत सिंह की उम्र मात्र 8 वर्ष थी और ठीक वर्ष बाद भगत सिंह ने भी उसी शान के साथ फांसी के फंदे को अपने गले में पहना।

इस छोटी से कहानी को सुनने के बाद आपको भगत सिंह के गुरु कर्तार सिंह सभारा के बारे में जानने की और इच्छा हुई होगी तो हम आपको निराश नहीं करेंगे।
कर्तार सिंह सराभा का जन्म 1896 में पंजाब प्रांत के लुधियाना के सराभा गांव में हुआ था। माता-पिता के इकलौते बेटे सराभा की अभी  बहुत छोटे ही थे कि पिता का निधन हो गया। लेकिन बड़े परिश्रम से उन्हें उनके दादा ने पाला। हालांकि, 9वीं तक पढ़ाई करने के बाद वे अपने चाचा के वहां चले गए। वहां उन्होंने 10वीं पास की और फिर कॉलेज की पढ़ाई करने लगे। लेकिन 1910-11 का समय था, देश में स्वतंत्रता को लेकर तमाम आंदोलन हो रहे थे इसी दौरान उनका मन विचलित हुए और 1912 में उन्होंने घरवालों से अमेरिका जाने की जिद की, उनकी जिद के आगे घरवाले झुक गए और वे अमेरिका चले गए।

गुलाम देश से आजाद देश में पहुंचे कर्तार सिंह सराभा के हृदय पर कदम-कदम पर चोट लगने लगी। गोरों की जबान से डैम हिंदू अर्थात तुच्छ हिंदू और ब्लैक मैन आदि शब्द सुनते ही वह पागल हो उठते। गोरों के अत्याचारों का ही नतीजा था कि उनके मन में स्वाधीनता के भाव जन्म लेने लगे। ऐसे में उन्होंने बिना अधिक सोचे भारतीय मजदूरों का संगठन शुरु किया। जिससे उनके मन में आजादी की भावना उभरने लगी। हर मजदूरों के साथ वे घंटों बैठकर समझने लगे कि अपमान से भरी गुलामी की जिंदगी से तो मौत हजार दर्जा अच्छी है। इसी कड़ी में 1912 में भारतीय लोगों की एक खास बैठक हुई। जिसमें चुनिंदा हिंदुस्तानी ही शामिल थे। सभी ने देश की आजादी के लिए तन मन धन न्यौछावर करने का प्रण लिया। जिसकी नतीजा यह हुआ कि धड़ाधड़ जलसे होने लगे, उपदेश होने लगे। काम से काम चलता गया। मैदान तैयार हो गया। फिर अखबार की जरुरत महसूस होने लगी। उसके बाद ही गदर नामक अखबार निकाला गया। जिसका पहला अंक नबंवर 1913 में निकाला गया। इसके संपादकीय विभाग में कर्तार सिंह सराभा भी शामिल थे। उनकी कलम में अथाह जोश था। उन दिनों अखबार को हैंड प्रेस पर छापा  जाता था। प्रेस चलाते हुए जब सरभा थक जाते थे तो वे पंजाबी में गीत गाने  लगते थे। जिसके बोल है - सेवा देश दी जिंदड़िए बड़ी आंखी। गल्लां करनीआं ढेर सुखल्लीयां ने। जिन्नां देससेवा विच पैर पाया। उन्नां लख मुसीबतां झल्लियां ने। जिसका हिंदी में अर्थ है - देशसेवा करनी बड़ी मुश्किल है, जबकि बातें करना खूब आसान। जिन्होंने देशसेवा के रास्ते पर कदम उठा लिया है वे लाख मुसीबतें झलते हैं।

विदेशों में भारतीयों की लड़ाई लड़ने के बाद कर्तार सिंह भारत वापस लौट आए। देश लौटने के बाद उन्होंने प्रचार तेज किया परिणामस्वरुप दिसंबर 1914 में मराठा नौजवान विष्णु गणेश पिंगले भी साथ आ गए। उनकी कोशिश से श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल और रासबिहारी पंजाब आए। कहीं भी कभी भी मीटिंग होती थी तो कर्तार सिंह पहली पंक्ति में ही मिलते थे। एक दिन सैनिक गठजोड़ हुआ और हथियारों के लिए पैसों की कमी को दूर करने के लिए डकैती का प्लान तैयार किया गया। एक दिन कर्तार सिंह की ही अगुवाई में उनकी टीम डाका डालने एक गांव पहुंची। डाका चल रहा था लेकिन एक साथी को घर में खूबसूरत लड़की दिखी उसे देखते हुए कर्तार सिंह के साथी ने उसका हाथ पकड़ लिया, लड़की ने घबराकर शोर मचा दिया तभी कर्तार सिंह ने आव ने देखा ताव रिवॉल्वर निकालकर अपने साथी के कनपटी पर लगा उसे निहत्था कर दिया और बोले - पापी तेरा अपराध बहुत गंभीर है तुझे सजा -ए-मौत मिलनी चाहिए लेकिन हालात की मजबूरी की वजह से तुम्हे माफ किया। फौरन उन्होंने लड़की के पांव में गिरकर माफी मांगी वहीं साथ में ही खड़ी लड़की मां के पैर पर गिरकर उन्होंने माफी मांगी और कहा कि अगर आपने उनके साथी को माफ नहीं किया तो अभी उसे गोली मार दिया जाएगा। लेकिन बात अभी इतनी बिगड़ी नहीं थी, लड़की और मां ने उस अपराधी को क्षमा कर दिया। ये नजारा देखकर लड़की की मां ने कर्तार सिंह से पूछा हे भले नौजवान आप ये सब क्यों कर रहे हो। तो उन्होंने बताया कि हथियार खरीदने के लिए रुपयों की कमी हो  गई थी, जिसकी वजह से उन्हें डकैती डालनी पड़ रही है। इसके बाद मां ने बताया कि लड़की की शादी करनी है अगर कुछ धन छोड़ जाते तो अच्छा होता। फिर क्या था कर्तार सिंह ने रुपयों की पोटली मां के चरण में रख दिया और बोला - शादी के जितने पैसों की जरुरत है आप ले सकती हैं। लड़की की मां ने कुछ पैसे रखकर बाकी के पैसे कर्तार सिंह की झोली में डाल दी और आशीर्वाद देते हुए कहा कि जाओ बेटा तुम्हे सफलता मिले।
डकैती जैसे भयानक काम में शामिल होने के बाद भी कर्तार सिंह का दिल कितना भावमय, पवित्र और विशाल था। वह इस घटना से जाहिर है।

फरवरी 1915 में विद्रोह की तैयारी थी। पहले हफ्ते में ही उन्होंने पिंगले और दो-तीन साथियों के साथ आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, मेरठ व अन्य कई स्थानों पर विद्रोह के लिए मेलमिलाप कर आए थे। 21 फरवरी 1915 का दिन भारत में विद्रोह का दिन तय हुआ था। लेकिन कर्तार सिंह को संदेह हुआ कि एक साथी किरणपाल सिंह की गद्दारी से सब धवस्त हो जाएगा। ऐसे में विद्रोह का दिन 19 फरवरी कर दिया गया। लेकिन रासबिहारी और कर्तार सिंह मिलकर यह भेद छिपा न पाए और आखिरकार जब कर्तार सिंह अपने 50-60 साथियों के साथ फिरोजपुर जा पहुंचे और विद्रोह की बात की, लेकिन उससे पहले किरणपाल से घर की भेदी बता दी थी। नतीजा यह हुआ कि हिंदुस्तानी सिपाही निहत्थे कर दिए गए, धड़ाध़ड़ गिरफ्तारियां होने लगी। हवलदार से मदद करने से साफ इंकार कर दिया। कर्तार सिंह को कोशिश असफल रही। जिसके बाद वे लाहौर लौट आए लेकिन आखिरकार वह पुलिस के हत्थे चढ़ गए। कर्तार सिंह हमेशा कहा करते थे वीरता और हिम्मत से मरने पर मुझे विद्रोही की उपाधि देना। कोई याद करे तो विद्रोही कर्तार सिंह कहकर याद करे।

गिरफ्तारी के बाद उनपर मुकदमा चला। उस वक्त उनकी उम्र साढ़े 18 वर्ष थी। लेकिन जज ने उन्हें खतरनाक अपराधियों में से एक बताया। एक दिन जब उनके बयान देने की बारी आई तो आप अदालत में ही क्रांतिकारी बयान देते रहे और जज कलम को दांतों के नीचे दबाए सुनता रहा। एक शब्द न लिखा बाद में सिर्फ इतना कहा - कर्तार सिंह अभी आपका बयान नहीं लिखा गया है। आप सोच समझ कर बयान दें। आप जानते हैं कि आपके बयान का क्या परिणाम हो सकता है? जवाब में कर्तार सिंह से उत्तर दिया वह सुन जज चकरा गया। कर्तार सिंह ने कहा कि फांसी ही तो चढ़ा देंगे और क्या? हम इससे नहीं डरते। अगले दिन फिर कर्तार सिंह का बयान अदालत में शुरु हुआ। इस बार कर्तार सिंह पहले से अधिक जोरदार और जोशीला भाषण देना शुरु कर दिया और अंत में वहीं हुआ जो हर क्रांतिकारी के साथ होता आया था। सजा-ए-मौत।

फांसी की सजा मिलने के बाद जब वे काल कोठरी में बंद थे तब उनके दादा उनसे मुलाकात करने पहुंचे। उन्होंने कर्तार से कहा - तुम जिनके लिए मर रहे हो वे तुम्हें गालियां दे रहे हैं। तुम्हारे मरने से देश को कुछ लाभ ऐसा नहीं दिखता है। जवाब में कर्तार सिंह से धीमे से पूछा - दादा जी फलां रिश्तेदार कहां है। कोई प्लेग से मर गया कोई हैजे से मर गया। तो क्या आप चाहते हैं कि कर्तार महीनों बिस्तर पर पड़ा रहे और किसी रोग से मरे। क्या उस मौत से यह मौत हजार गुना अच्छा नहीं है। दादा जी अब चुप हो गए थे।

डेढ़ साल मुकदमा चला। 16 नवंबर 1915 का दिन था। जब उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। उस दिन भी वे हमेशा की तरह खुश थे और भारत माता की जय कहते हुए फांसी के तख्ते पर झूल गए।

आज फिर यह सवाल उठता है कि उनके मरने से क्या लाभ हुआ? वह किसलिए मरे? इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है। वह देश के लिए मरे। उनका आदर्श ही देशसेवा के लिए लड़ते हुए मरना था। वे इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे। मरना भी गुमनाम रहकर चाहते थे।