जवाहर लाल नेहरु का विरोध करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कहानी

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी अनुच्छेद 370 के मुखर विरोधी थे। वह कश्मीर को पूरी तरीके से भारत का हिस्सा बनाने चाहते थे, लेकिन अब कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी अनुच्छेद 370 के मुखर विरोधी थे। वह कश्मीर को पूरी तरीके से भारत का हिस्सा बनाने चाहते थे, लेकिन अब कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। देश में एक विधान, दो विधान और दो प्रधान नहीं चलेंगे का नारा देने वाले मुखर्जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के मुखर विरोधी थे। 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में जन्मे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता का नाम आशुतोष मुखर्जी था, जो बंगाल में एक शिक्षाविद् और बुद्धिजीवि के तौर पर जाने जाते थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियों को पढे।

  • कलकत्ता विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करने के बाद 1926 में वह सीनेट के सदस्य बने और साल 1927 में उन्होंने बैरिस्टरी की परीक्षा पास की।
  • मात्र 33 साल की उम्र में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बन गए थे। वे चार तक कुलपति रहे बाद में वह कलकत्ता विधानसभा पहुंचे।
  • तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपनी अंतरिम सरकार में मंत्री बनाया था। हालांकि, बाद में उन्होंने नेहरु पर तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर-संघचालक गुरु गोलवलकर से परामर्श लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को राष्ट्रीय जनसंघ की स्थापना की, जिसका बाद में जनता पार्टी में विलय हो गया और फिर पार्टी के बिखराव के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ।
  • जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने की मांग को लेकर वह 8 मई 1953 को दिल्ली से कश्मीर के लिए निकल पड़े दो बाद 10 मई को जालंधर में उन्होंने कहा था कि हम जम्मू-कश्मीर में बना किसी के परमिशन जाए, यह हमारा मूलभूत अधिकार होना चाहिए।
  • 11 मई को श्रीनगर जाते वक्त उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, जेल से रिहा किए जाने के बाद 22 मई को उनकी अचानक तबीयत खराब हो गई और 23 जून को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई।