आजादी में RSS की भूमिका

संघ ने स्थापना के बाद से ही आजादी तक तो संघर्ष किया ही। लेकिन जब 1947 में भारत आजाद हुआ तो चुनौतियां और भी बड़ी थी।

आजादी में RSS की भूमिका
RSS

भारत में इन दिनों दो विचारधाराओं में संघर्ष जारी है। पहला राष्ट्रवादी तथा दूसरा वामपंथी, जिन्हें तथाकथित सेक्युलर भी कहा जा सकता है। जबकि राष्ट्रवादी विचारधारा का कॉन्ट्रैक्ट राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के पास है, जिसका प्रयोग सियासी तौर पर भारतीय जनता पार्टी करती रहती है। ऐसे में भला जब विचारधाराओं का सामना हो तो यह प्रश्न एक दूसरे पर हमेशा उछलते रहते हैं कि आजादी की लड़ाई में किसका योगदान ज्यादा था? वैसे से कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि आजादी की लड़ाई में अगर किसी सियासी पार्टी ने सबसे ज्यादा योगदान दिया तो वह कांग्रेस थी। जिसकी स्थापना 1885 में हो गई थी। वहीं आरएसएस और कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1925 में हुई, जिनका वजूद आज भी है।

लेकिन जब 2014 में केंद्र की सत्ता में भारतीय जनता पार्टी आई तो राष्ट्रवाद को लेकर एक नई बहस शुरु हो गई। सत्ता का विरोध करने वालों तो देश विरोधी का तमगा दे दिया जाता है तो वामपंथी और कांग्रेस समेत सभी बीजेपी विरोधी संघ पर यह आरोप लगाते हैं कि आजादी की लड़ाई में संघ ने कतई योगदान नहीं दिया। लेकिन ये बात बिल्कुल भी सही नहीं है। संघ ने स्थापना के बाद से ही आजादी तक तो संघर्ष किया ही। लेकिन जब 1947 में भारत आजाद हुआ तो चुनौतियां और भी बड़ी थी। क्योंकि उस वक्त हिंदुस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन हमसे ही अलग हुआ पाकिस्तान हो चुका था। सीमाएं असुरक्षित थी। उस वक्त बिना किसी प्रशिक्षण के RSS के स्वंयसेवक अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना का गतिविधियों पर नजर बनाए हुए थे और यह काम न नेहरु-माउंटबेटन सरकार कर रही थी और न ही हरि सिंह की सरकार।

उसी समय में जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की तो सैनिकों के साथ संघ के कई स्वंयसेवकों ने मातृभूमि की रक्षा करते  हुए लड़ाई में अपने प्राण देश के नाम कर दिए। 1947 में जब महाराजा हरि सिंह नेहरु के अड़ंगे की वजह से विलय का फैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबायलियों के वेश में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसरी जा रही थी तब नेहरु सरकार हम क्या करें वाली मुद्रा में मुंह बिचकाए बैठ थी। उस वक्त सरदार पटेल ने तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर से मदद मांगी, जिसके बाद गोलवलकर श्रीनगर पहुंचे और महाराजा हरि सिंह से मुलाकात कर उन्हें भारत में विलय के लिए प्रेरित करते हुए उनकी शंकाओं का समाधान किया।

इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय-पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया।  सेना ने कश्मीर पहुंचने से पहले 13 अक्टूबर 1947 को बलराज मधोक और मेहरचंद ने रात से 12 बजे से लगकर सुबह तक 500 से अधिक स्वंयसेवकों को इकट्ठा किया और ट्रकों में सवार होकर स्वंयसेवक लाठी-डंडा लेकर खंखार हथियारबंद कबायलियों की सेना से लड़ने बादामी बाग छावनी की ओर रवाना हो गए। स्वयंसेवकों ने हवाई पट्टियां बनाकर सेना का मार्ग प्रशस्त किया। वहीं दूसरी ओर कोटली में वायुसेना के गोले-बारुद को बचाने में चंद्रप्रकाश और वेदप्रकाश शहीद हो गए।  बाकी लोगों ने मिलकर खाद्य सामग्री और हथियार सेना तक पहुंचाए। वहीं पलारी में देश सेवा करते हुए 100 से अधिक स्वंयसेवक शहीद हो गए।

बीजेपी नेता संजय जोशी के मुताबिक, सन् 1954 में संघ के नेतृत्व में ही दादरा नगर हवेली और गोवा का भारत में विलय हुआ। 21 जुलाई 1954 को दादरा को संघ के स्वयंसेवकों ने ही पुर्तगालियों से मुक्ति दिलाई। 28 जुलाई को नरौली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुर्तगाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया। पूरा दादर नगर हवेली पुर्तगाल के कब्जे से मुक्त कराकर भारत सरकार को सौंप दिया गया। 

संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रुप से शामिल हो चुके थे। गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेम करने से प्रधानमंत्री नेहरु के इंकार करने पर संघ प्रचारक जगन्नाथराव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंचकर आंदोलन शुरु किया। इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि जगन्नाथराव जोशी समेत संघ के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। अतः जब हालात बिगड़ने लगे तब भारतीय सैनिकों को हस्तक्षेप करना पड़ा और आखिरकार 1961 में गोवा का भारत में विलय हुआ।

संघ के शौर्य की कथा यहीं नहीं रुकती। 1962 में जब चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ तब भारतीय सेना की मदद के लिए जिस उत्साह से संघ के कार्यकर्ता युद्ध क्षेत्र में पहुंचे, उसे पूरे देश ने सराहा। स्वयंसेवकों ने जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी। जैसे सैनिक आवाजाही मार्गों पर चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और यहां तक कि बाद में शहीदों के परिजनों की सहायता भी की। इसका नतीजा यह हुआ कि संघ से विशेष प्रेम न रखने वाले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को 1963 की 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का न्यौता देना पड़ा और मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण के बाद भी संघ के 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हुए और परेड की शान बने।

हालांकि, आज भी लोग संघ की जमकर आलोचना करते हैं। उस समय भी कईयों ने 26 जनवरी की परेड में संघ को निमंत्रण देने पर पंडित नेहरु की आलोचना की थी। उस पर प्रधानमंत्री नेहरु ने कहा था कि यह दर्शाने के लिए केवल लाठी के बल पर सफलतापूर्क बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा जा सकता है, इसी वजह से विशेष रुप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए RSS को आकस्मिक निमंत्रण किया गया। 

वहीं 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कानून व्यवस्था संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया था, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। वहीं संघ के हजारों कार्यकर्ताओं ने घायल सैनिकों के लिए रक्तदान भी  किया। फिर 1971 के  युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाई पट्टियों से बर्फ हटाने का काम संघ से स्वयंसेवकों ने किया था।

वहीं आज जब देश में प्राकृतिक आपदाएं तबाही मचाती हैं तब भी संघ के स्वयंसेवक लोगों की सेवा में लग जाते हैं।