कांग्रेस में अभिव्यक्ति की आजादी नाम की चिड़िया जिंदा है?

संविधान के आर्टिकल 19 की दुहाई देने वाली कांग्रेस पार्टी में क्या अपने विचार रखने का अधिकार है? क्या अपने अभिव्यक्ति को प्रकट करने का अधिकार है? क्या भाव को जाहिर करने का अधिकार है?

कांग्रेस में अभिव्यक्ति की आजादी नाम की चिड़िया जिंदा है?
Aditi Singh Vs Priyanka Gandhi

संविधान के आर्टिकल 19 की दुहाई देने वाली कांग्रेस पार्टी में क्या अपने विचार रखने का अधिकार है? क्या अपने अभिव्यक्ति को प्रकट करने का अधिकार है? क्या भाव को जाहिर करने का अधिकार है? ये सवाल इस लिए जरुरी हो जाता है कि हमेशा कांग्रेस पार्टी वामपंथियों के साथ मिलकर यह रोना रोती है कि मोदी सरकार ने देश में संविधान का गला घोंट दिया है। किसी को बोलने का अधिकार नहीं है, किसी को सरकार का विरोध करने का अधिकार नहीं है। अंग्रेजी भाषा में कांग्रेस पार्टी कहता है कि मोदी सरकार ने देश में फ्रीडम ऑफ स्पीच और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का नामोनिशां खत्म कर दिया है। लेकिन जब खुद की पार्टी की बात आती है तो कांग्रेस स्वंय इन संवैधानिक अधिकारों को हनन करती है।

नवीनतम मामला रायबरेली सदर की विधायक अदिति सिंह के साथ का है। जिन्होंने बसों को लेकर सियासत कर रही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को नसीहत दी तो उल्टा उन्हें कांग्रेस महिला विंग से सस्पेंड कर दिया गया। अदिति सिंह विधायक होने के साथ-साथ महिला भी हैं। सबसे बड़ी बात वे भी भारत की नागरिक हैं और उन्हें भी उतने ही संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जितने सोनिया गांधी या प्रियंका गांधी को। जब बसों के सियासत को लेकर प्रियंका गांधी लगातार यूपीवालों के निशाने पर आ रही थी तो क्या वे अदिति सिंह के बयान के दरकिनार कर कभी आराम से उनसे बात कर लेती। पर ऐसा नही हुआ, उल्टा एक बड़ा वर्ग अब अदिति सिंह के समर्थन में आ गया और प्रियंका गांधी फिर से निशाने पर। यही वह समय था जब कांग्रेस बड़ा दिल दिखाती और जिन बातों को वो जनता के सामने कहती है, उसे चरितार्थ कर यह साबित करने की कोशिश करती कि कांग्रेस की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है।

वैसे में उत्तर प्रदेश में सियासत के हाशिए पर लटक रही कांग्रेस पार्टी को अदिति सिंह जैसे विधायक की जरुरत है, जो पार्टी को मजबूती प्रदान करने में योगदान दे सकती थी। लेकिन कांग्रेस पार्टी गांधी परिवार के इतर ज्यादा नहीं सोचती। पिछले 2 दशकों में कांग्रेस पार्टी का समानार्थी शब्द गांधी परिवार है। जो व्यक्ति गांधी परिवार का वफादार है, सही मायने में वही सफेद टोपी वाला सच्चा कांग्रेसी है। हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं है कि कांग्रेस ने गांधी परिवार के किसी शख्स पर अंगुली उठाने वाले को पार्टी से बाहर निकाला है। इससे पहले सैकड़ों उदाहरण हैं।

दरअसल संवैधानिक अधिकारों, अभियक्ति की आजादी जैसे लड़ाई कांग्रेस इसलिए लड़ती है कि जिससे गांधी परिवार का वर्चस्व कायम रहे। कांग्रेस में सभी संवैधानिक अधिकार सिर्फ गांधी परिवार को ही प्राप्त हैं या फिर जिनके ऊपर गांधी परिवार की छत्रछाया है कदाचित उन्हें भी यह अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। लेकिन गतली से अगर कोई कांग्रेस जोकि भारतीय भी है, वह अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए सत्य बोल दे तो उसका कांग्रेस से टिकट कटना पक्का होता है। वही अदिति सिंह के साथ भी हुआ। 

हालांकि, ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ कांग्रेस पार्टी में होता है। सभी राजनैतिक दलों में आलाकमान को ही संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं। कार्यकर्ताओं या छोटे नेताओं को किसी भी प्रकार के अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं और गलती से उन्होंने ऐसा कर लिया तो अगले दिन उनके सिर से उस सियासी पार्टी की टोपी गायब हो जाती है। जिस प्रकार न्याय सिर्फ अमीरों के लिए उसी प्रकार राजनीति में अभिव्यक्ति की आजादी नाम की चिड़िया सिर्फ आलाकमान नेताओं के लिए है।