वैश्विक महामारी से हमारी जंग और व्यवस्था

कोरोना (covid-19) विषाणु जनित महामारी से  इस समय  पूरा विश्व अपने अपने ढंग से जूझ रहा है | हर देश एकजुट होकर इसके इसके खिलाफ रणनीति बना रहा है,

वैश्विक महामारी से हमारी जंग और व्यवस्था

सुभाष तिवारी की कलम से - कोरोना (covid-19) विषाणु जनित महामारी से  इस समय  पूरा विश्व अपने अपने ढंग से जूझ रहा है | हर देश एकजुट होकर इसके इसके खिलाफ रणनीति बना रहा है, लड़ रहा है वो चाहे यूरोप के देश हों, अमेरिका हो वियतनाम हो दक्षिण कोरिया हो अथवा इस महामारी के जनक के रूप में कहा जाने वाला चीन हो| इन सब ने पूर्ण रूप से न सही  पर काफी हद तक महामारी के नियंत्रण में या तो सफलता पाई है अथवा पूरी सिद्दत से उसके लिए प्रयासरत हैं | वहीं दूसरी ओर जब हम अपने देश में देखते हैं तो पाते हैं कि किस तरह से एक तरफ देश में स्वास्थ्य कर्मी, चिकित्सक, सफाई कर्मी ,पुलिस , समाजसेवी एवं अन्यान्य  बहुत सारे लोग इस कोरोना जैसे महामारी के संकट से लड़ने में तत्पर हैं| बहुत से लोग अपना सब कुछ दांव पर लगा कर इससे लड़ रहे हैं | वहीं दूसरी ओर जब देखते हैं कि जिनके हाथ में प्रबंधन है, जो नीति निर्धारक हैं इस देश के;  राजनैतिक लोग हैं वे  किस तरह से अनिश्चितता और दिशा हीनता के शिकार हैं।

हमारे देश में राज्यों में आपसी समन्वय का अभाव, सत्ता के लिए दलों की गला काट निम्नस्तरीय प्रतिद्वंद्विता और विद्वेष, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, व्यक्तिगत अहंकार आदि विकृतियां इस महामारी के संकट से लड़ने में कितनी बड़ी बाधक सिद्ध हो रही हैं| इनके कारण ही ये वैश्विक महामारी हमारे लिए कितनी विकराल हो गई है।

यदि हम कुछ समय पहले हुए राजनीतिक घटनाक्रमों को देखें तो दीखता है कि किस तरह से राजनैतिक घटनाक्रम में सरकारों को गिराना, बनाना और और अंतर्राष्ट्रीय बड़ा राजनैतिक कार्यक्रम देश में आयोजित किया गए  जबकि कोरोना  संक्रमण के देश में आने की सूचना जनवरी माह में ही आ चुकी थी | हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसके महामारी होने की घोषणा मार्च के मध्य में की और फिर हमारे यहाँ एकदम से लॉक डाउन घोषित कर दिया गया | यदयपि इसके पूर्व अनेक धार्मिक और इससे इतर कार्यक्रम देश भर में हो रहे थे परन्तु जमातियों को ही  पूरे देश में कोरोना फैलाने का जिम्मेदार बताया गया | हिन्दू-मुस्लिम की सतत समस्या से इसे जोड़ दिया गया|  मेरा आशय इसमें जमातियों को पाकसाफ बताना नहीं है पर जिस तरह से विभिन्न मीडिया माध्यमों से  बार-बार यह यह प्रचारित किया गया उससे ऐसा लगा कि जैसे कोरोना इस समय गौड़ समस्या हो और ये सिर्फ हिन्दू मुशलमान के युद्ध में मात्र एक हथियार हो जो सिर्फ हिन्दुओं को नुकसान पहुचाने के लिए प्रयोग किया जा रहा हो ||

हमारे यहां सरकारें और राजनीतिक दल कभी भी अपनी कमियां स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते| सत्ताधारी सदैव अपनी नाकामियों को या तो विपक्षी दल पर डाल देते हैं या फिर उनके विचार में सब कुछ ठीक हो रहा होता है वहीँ विपक्षी सरकार के हर कार्य में खोट निकलने में व्यस्त रहते हैं बजाय रचनात्मक भूमिका के।

जब कोरोना जैसी वैश्विक महामारी हो और हमें इस समस्या से निपटने के लिए रणनीति बनानी हो ऐसे समय में हमारे राजनीतिज्ञ अपने द्वारा पूर्व में लिए गए फैसलों को बढ़ा चढ़ाकर बताते हुए स्वयं अपनी पीठ ठोकते हैं और चुनावी रैली की तर्ज पर भाषण देते हैं | कितने शर्म की बात है कि लगातार दूसरी बार सत्तारूढ़ अभी भी अनेक विपत्तियों और विसंगतियों का कारण विपक्ष को ही ठहरा रहे हैं, अपने शासन और पूर्व में विपक्ष के लम्बे शासन का तुलनात्मक विश्लेषण बता कर विभिन्न गतिविधियों से इस संकट में भी सोशल मीडिया पर अपना जनाधार परीक्षण कर रहे हैं।

हाल ही में उत्तर प्रदेश में वापस लौट रहे श्रमिकों की वापसी संबंधी समस्या आई इसके लिए जब विपक्षी दल के नेता ने सहायता के रूप में बसों को लगाने की बात कही तो किस तरह से मुख्यमंत्री ने उसे राजनीतिक दांवपेच समझते हुए उसमें खिलवाड़ करना शुरू किया| इस में राजनैतिक मंशा से इनकार नहीं किया जा सकता पर समय की मांग इस प्रकार के खेल की नहीं थी।

दरअसल हमारे यहां हर समस्या में भी राजनीतिक शह और मात का खेल चलता है| व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को समस्या के समाधान के स्थान पर अडंगे के रूप में लगा दिया जाता है। मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘शतरंज’ के उन दो  पात्रों की तरह जो शह मात के खेल में इतना व्यस्त रहते हैं कि उस समय लखनऊ पर कंपनी सरकार की हुकूमत हो जाती है पर वह अपने खेल को छोड़कर युद्ध  के संबंध में विचार करने की आवश्यकता नहीं समझते | उसी तरह से हमारे यहां इस समय इस महामारी के दौर में शह और मात का खेल ज्यादा जरूरी है ना कि समस्या का समाधान ,कम से कम राजनीतिज्ञों को देखकर तो ऐसा ही लगता है।

हर राज्य दूसरे पर गलत प्रबंधन का आरोप लगा रहा है यदि इनमे समन्वय ठीक हो  तो एक दूसरे राज्यों में जाने वाले श्रमिक और प्रवासी व्यवस्थित तरीके से बिना किसी समस्या के आ जा सकते हैं | पर यहां तो जो दल दूसरे राज्य में विपक्ष में है वह सत्ताधारी दल पर असफल होने का आरोप लगाकर उसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है और वही दल उन राज्यों में कुछ नहीं बोलता जहां पर वह सत्ता में है| इस प्रकार की घटनाएं यह साबित करती हैं कि हमारे देश के राजनीतिज्ञ किस हद तक अपने सत्ता स्वार्थ में डूबे हुए हैं और उन्हें जनता की कितनी फिक्र है।

हमारे देश में फिल्में बहुत चलती हैं उनकी कहानियां,अभिनय  और संवाद पसंद किये जाते हैं| इस देश के युवा और समाज के अंतर्मन में फिल्मों की कहानियों को अपने जीवन में उतरते हुए देखने की चाहत रहती है| इस भावनात्मक स्थिति  का फायदा ये राजनीतिज्ञ भली भांति उठाते हैं | ये समाज और युवा को आभास कराते हैं कि जैसा फिल्मों में घटित होता है वह घटना है आपके जीवन में सच होने के करीब है| शायद इसी कारण से कई बार फिल्मी स्टाइल के निर्णय लिए जाते हैं,  फिल्मों की तरह भावनात्मक ज्वार लाने वाले फैसले  किए जाते हैं जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है|  हाल ही में आई एक फिल्म बाहुबली का प्रसिद्द् संवाद है  “यह मेरा वचन है ! और मेरा वचन ही है शासन|” उसी की तर्ज पर हमारे यहाँ भी  अनेक निर्णय लिए गए हैं फिर उनको यें केन प्रकारेण उचित सिद्ध किया गया है।

प्रबंधन के अंतर्गत निर्णय लेने हेतु दो प्रमुख  तरीके अपनाये  जाते हैं|  एक ; हम पहले सोच समझ कर किसी समस्या के बारे में गंभीरता से विचार कर रणनीति बनाकर के निर्णय करें फिर उस पर अमल शुरू हो और दूसरा; त्वरित निर्णय मतलब समस्या को देखते ही पहले निर्णय ले लें  और फिर बाद में उस निर्णय को सही सिद्ध करने के लिए विचार और विमर्श करें | दोनों प्रकार के निर्णयों के अपने फायदे और नुकसान हैं।

प्रायः व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए या व्यक्तिगत जीवन में सफलता पाने के लिए या व्यक्तिगत समस्या के निदान के लिए  दोनों  में से किसी भी प्रकार का निर्णय लिया जा सकता है क्योंकि उसमें सफलता या  असफलता दोनों का ही प्रभाव व्यक्ति तक सीमित रहता है | पर जब समस्या व्यक्ति या लघु समुदाय के स्थान पर पुरे  समाज अथवा देश की हो तो और उसके संबंध में निर्णय करना हो त्वरित निर्णय का सिद्धांत कम उपयुक्त प्रतीत होता है| ऐसे विषयों में पहले विचार आवश्यक होता है क्योंकि इसकी सफलता और असफलता व्यक्तिगत न होकर पुरे देश से  जुड़ी हुईहोती है।

पूर्व में अनेक विषयों में निर्णयों से लेकर वर्तमान में कोरोना जैसी गंभीर समस्या पर निर्णय के सम्बन्ध में विचार करने पर यही प्रतीत होता है की निर्णय पहले हो गया और उचित विचार बाद में किया गया जिसके कारण ही सरकार को बार बार उन निर्णयों के सम्बन्ध में दिए गए सपष्टीकरणों में भी बदलाव करना पड़ा| 
कोरोना को ही ले लीजिये; इसके संबध हुए लाक डाउन के बारे में पहले अनेक माध्यमों से, समझाया गया की इससे मध्य मई तक संक्रमण पर काबू पा लिया जायेगा और जब यह नहीं होता हुआ दिखा तो लाक डाउन लगभग खोलकर कहा जा रहा है की यदि ये न हुआ होता तो आज 1 लाख से अधिक की संख्या का संक्रमण कई लाख में होता| अब हमारे पास सरकार की दोनों बातों पर भरोसा करके समर्थन में  ताली , थाली बजाने और माला फूल चढाने के अलावा एक मात्र देशद्रोही और गद्दार बनने का विकल्प ही बचता है जिसे कोई भी स्वीकार नही करेगा|